r/Hindi • u/saifnsadness • 22h ago
साहित्यिक रचना ye kab ki baat hai?
Raja bola raat hai
Rani boli raat hai
Mantri bola raat hai
Santri bola raat hai
Sab bole raat hai
Ye subah subah ki baat hai.
~ Gorakh Pandey(not completely sure)
r/Hindi • u/Eastern-Emotion9685 • Mar 03 '26
मुझे पता है आप लोग कहेंगे कि इसमें वर्तनी की गलतियाँ हैं, लेकिन मैंने शब्दों को वैसे ही लिखा है जैसे हम यहाँ उच्चारण करते हैं। Eg - वह "देखीं" होता है पर हम यहा बड़ी "ई" नहीं खिचते सिर्फ छोटी "इ" इसतेमाल करते है पर लिखते आम हिंदी की तरह लिखते है ।
r/Hindi • u/AutoModerator • Apr 05 '26
मजमा पसंद
थे लोग ई हो
जका राम रै साथै होवण रो भरम पाळो
राम रै वनगमन में
सीता रो साथ जायज ठहरावता थकां ई
सोनलिया हिरण रै आखेट सारू
बणाओ सीता नैं ई दोसी
हरण में
लिछमण-रेख उलांघण रै आरोप री
लुकी-छुपी आंगळ्यां ई सीता कानी करता
राम रो दुख मोटो देखो हो
सत्य, पवित्रता रा आंदोलनकारियां
जुध में संघार रो दोस
सीता रै माथै धरता थकां
उकसावो अगन-पारखा सारू
थे ईज हो बै भीड़ री भेड़ां
जकी गरभवती लुगाई नैं
घर सूं कढवाओ
हाका हूक सूं
छद्म न्याव रो ढोंग रचवा’र
दिखावो
राम नैं बापड़ो
धिन्न है थांरी दोरंगी सोच, चिंतना
कै सीता रै निरवासन नैं जायज बतावता
उणरै जमीन में समाईज्यां पछै
स्त्री रै स्वाभिमान री बात करो
बजाओ ताळ्यां
बळी लेय’र निरदोस री
पोमीजो
आपरै दोस नैं सतीत्व रै महिमा-मंडण सूं
ढांपणै री कोसिस करता
रचो सती महिमा रा गीत
थरपो उणनैं देवी
थांरी मजमैबाजी सीता, द्रौपदी सूं लेय’र
आज तांई बा ईज है
हर बार थांरी जबान री वेदी पर
हुवती आई है स्त्री री चारित्रिक, शारीरिक हत्या
अर थे पीटो ताळ्यां?
कदी न्याय रै नांव, कदी धरम रै नांव
कदी मूल्यां रै लेखै,
लेवता रैवो भख
बेकसूर लुगाईजात रो...?
r/Hindi • u/saifnsadness • 22h ago
Raja bola raat hai
Rani boli raat hai
Mantri bola raat hai
Santri bola raat hai
Sab bole raat hai
Ye subah subah ki baat hai.
~ Gorakh Pandey(not completely sure)
r/Hindi • u/Mission-Sun-5131 • 9h ago
बातें छोटी हो तो क्या बात है,
मीठी हो तो अलग ही बात है ||
किसी के लिए बोलो तो ज़ज्बात है,
किसी के पीछे बोलो तो गलत बात है ||
गलत बोलो तो बकबास बात है,
और सही बोलो तो बेहिसाब है ||
धन्यबाद
r/Hindi • u/jay_prakash • 1h ago
और हमको कुछ नहीं आता है!
अभी भी बच्चे स्कूल में पंडितों का मज़ाक बनाते हैं इस तरह??
r/Hindi • u/Mission-Sun-5131 • 3h ago
प्यासे के लिए अमृत है जो.
अगर गले से उतर जाये ||
खेतो के लिए जीबन है जो,
अगर समय पे मिल जाये ||
अगर नदी मैं अपनी सीमाओं में रहे तो
शांत और जीबनदायी होती है ||
सीमाओं के बाहर चला जाये तो
बाड़ ले अति है ||
अगर आंख से बेह जाये तो,
मन का क्लेश दूर होती है ||
और, अगर गंगा मै बेह जाये तो,
पापीओ के पाप धो देती है ||
धन्यबाद
r/Hindi • u/albatgalbat • 10h ago
r/Hindi • u/Alternative_Bell1099 • 19h ago
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r/Hindi • u/Alternative_Bell1099 • 19h ago
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r/Hindi • u/Alternative_Bell1099 • 1d ago
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r/Hindi • u/Mission-Sun-5131 • 1d ago
वो चली गयी, लेकिन उसकी याद क्यों अति है?
याददें क्या है, वो क्या सिर्फ आशु है?
अच्छे पालो की याद मैं काम,
लकिन बिछरने की याद मैं बहुत आते है ......
r/Hindi • u/only1kshitiz • 1d ago
🎬 My First Hindi AI Fantasy Film Is Live! ✨
I’ve just launched my new YouTube channel, KahaniVerse Hindi, with an original magical story: छह बहनों का जादुई जलेबी महल 🍯🏰
It’s a short fantasy adventure about six sisters, a magical jalebi palace and a storm that threatens their creation.
I’d love constructive feedback on the storytelling, visuals and editing.
Watch here: https://youtu.be/TN7B8OAiEII
Thanks for supporting an independent creator! ❤️
r/Hindi • u/Mission-Sun-5131 • 1d ago
फूल अगर मुरझा भी जाये तो उसकी खुसबू रह जाती है,
रिश्ते अगर बिगड़ भी जाये तो उसकी याद रह जाती है ।।
कपड़ो मैं अगर दाग लग जाए तो वो उठ भी जाती है
मगर शीशे मैं अगर दरार आ जाये तो वो रह जाती है।।
धन्यवाद
r/Hindi • u/coldtara • 1d ago
समंदर का रोना भी, किसको पता चलता है? भीड़ में चीख़ती आवाज़ों का, किसको पता चलता है?
इस मुजरिम को ज़ुल्म की तालीम किसने दी थी, इन हवाओं में पल रहे तूफ़ानों का, किसको पता चलता है?
बरबाद हैं मगर ख़ुद को बरबाद भी नहीं कर सकते, मेरे न होने से, अब भी किसी को, पता चलता है।
किसी के किए गुनाहों का, ख़ामियाज़ा सबको भुगतना पड़ा तुम्हारी ग़फ़लत का नतीजा, सबको पता चलता है।
कुछ पुण्य करने से इनके सारे पाप ढक जाएँगे, इनके पाप का घड़ा भरना, किसको पता चलता है?
r/Hindi • u/abhir00p • 1d ago
r/Hindi • u/FeeSome1421 • 1d ago
The first one:
Ke jise chadh jaaye Ghalib, uske liye paani bhi sharaab hai,
Jise na chade to sharaab bhi kabaab hai.
Ke ae sharaab, tu cheez badi kharaab sahi,
Magar is mukammal jahan mein khushi ki jagah tu hi hai.
Here's the other one:
Lahu bahaana seekh lo Ghalib,
Ke ae zamaana bada zaalim hai.
Narm-dili ka yahan koi daam nahi,
Yahan sharafat hi sabse bada gunah hai.
r/Hindi • u/OneEngineer7439 • 2d ago
r/Hindi • u/CodeNegative8841 • 2d ago
क्या हमारे पापों का बोझ उठाने के लिए कोई और तैयार है? स्वयं के कर्मों के प्रति हमारी उत्तरदायित्वता की एक कालजयी कथा।
बीहड़ के सन्नाटे में उसकी हिंसक आँखें शिकार की तलाश में थीं... पर रत्नाकर को क्या मालूम था कि आज उसका सामना किसी राहगीर से नहीं, बल्कि स्वयं उसकी अपनी नियति से होने वाला था।
बोहनी की आस में टकटकी लगाए, जंगल के सन्नाटे को चीरती एक जोड़ी हिंसक आँखें बरगद की ओट से रास्ते को निहार रही थीं। वह डाकू रत्नाकर था, जिसके आतंक ने इस बीहड़ के रास्तों को सूना कर दिया था।
कई दिन बीत गए थे, कई सूरज ढल चुके थे, पर उसकी कुल्हाड़ी को कोई शिकार प्राप्त नहीं हुआ था। घर में भूख से बिलखते बच्चे, बूढ़े माता-पिता और सूली पर टंगे आत्मसम्मान का बोझ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। आज अगर वह खाली हाथ लौटा, तो अपनों की तीखी निगाहों का सामना कैसे करेगा? इसी उधेड़बुन में उसका हाथ गंडासे पर कस जाता है।
तभी विंध्य के उस शांत जंगल में एक अनूठा स्वर गूँजता है। कोई महात्मा बिना किसी भय के, नारायण के नाम में मगन, वीणा की तान छेड़ते हुए चले आ रहे थे, जिनके चेहरे का तेज इस बात का प्रमाण था कि वे संसार के सारे बंधनों से मुक्त हैं।
रत्नाकर ने एक पल को सोचा—इस संन्यासी को लूटकर क्या मिलेगा? दो समय की रोटी का प्रबंध भी न हो सकेगा। पर तभी भूखे बच्चों की पुकार उसकी अंतरात्मा पर भारी पड़ जाती है। वह गंडासा लहराते हुए सीधे महात्मा के सामने कूद पड़ता है।
हैरानी की बात थी कि सामने साक्षात् काल को देखकर भी महात्मा के चेहरे से मुस्कान विलुप्त नहीं हुई। उनकी आँखों में डर की जगह एक असीम करुणा थी। रत्नाकर ने गंडासे की धार उनकी गर्दन पर टिकाते हुए कड़ककर कहा, "ऐ संन्यासी! रुक जा। तेरे पास जो भी मूल्यवान है, तुरंत मेरे हवाले कर, वरना जीवन का अंत समझ!"
महात्मा ने शांत भाव से अपनी वीणा को छुआ और बड़ी सहजता से पूछा, "पुत्र, ठहरो! पहले मुझे यह तो समझाओ कि आखिर मूल्यवान क्या है? तुम किस वस्तु को अनमोल समझते हो?"
रत्नाकर झल्लाकर बोला, "मूर्ख मत बन! सोना, चांदी, हीरा और बहुमूल्य रत्न... ऐसी हर वो चीज़ जिसका मोल संसार में सबसे अधिक हो, वही मूल्यवान है।"
महात्मा मुस्कुराए, और कहा, "लेकिन यह मोल तय कौन करता है?”
“यह सब तो संसार ने पहले से ही तय कर रखा है।” रत्नाकर ने उत्तर दिया।
“आज जिसे तुम स्वर्ण कह रहे हो, भूख से मरते इंसान के लिए उसकी कीमत एक सूखी रोटी के टुकड़े से भी कम हो जाती है। यह मूल्य वस्तु में नहीं, तुम्हारी चाहत में है।” महात्मा ने सहजता से कहा।
“सोना, चांदी और रत्नों आदि से ही तो जनमानस को प्रसन्नता मिलती है। आनंद मिलता है।” रत्नाकर ने बिना झिझके कहा।
“क्या इन सबसे तुम्हें सच में प्रसन्नता मिलती है?” महात्मा ने पुनः पूछा।
“क्यों नहीं। जिसमें मेरा परिवार प्रसन्न, उसी में मेरी भी प्रसन्नता है।” रत्नाकर ने दृढ़ स्वर में कहा।
“और तुम्हारी व्यक्तिगत प्रसन्नता का क्या?” महात्मा अपने प्रश्न पर अडिग रहे।
“अपने परिवार का पोषण करना ही तो मेरा कर्तव्य है।” रत्नाकर अब असमंजस में था।
“तुम जिसे कर्तव्य समझकर यह क्रूरता कर रहे हो, क्या कभी उस सत्य को भी टटोला है कि इस भयंकर पाप की आग में तुम्हारा परिवार भी तुम्हारे साथ जलेगा? क्या वे तुम्हारे इस कर्मफल के साझीदार बनेंगे?"
रत्नाकर ने सीना तानकर कहा, "क्यों नहीं! मैं यह अधर्म उन्हीं के पेट की खातिर तो कर रहा हूँ। वे मेरे सुख-दुख और पाप-पुण्य, सब में मेरे साझीदार हैं।"
महात्मा ने मंद मुस्कान के साथ कहा, "तो फिर विलंब कैसा? एक बार घर जाकर अपनी गृहस्थी से यह सवाल पूछ आओ।”
“जाकर पूछ आऊं! ताकि तुम यहाँ से भाग जाओ?” रत्नाकर के मुख पर एक कुटिल मुस्कान थी।
“मैं वचन देता हूँ, तुम्हारे लौटने तक मैं इसी वृक्ष के नीचे तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। मैं यहाँ से भागूँगा नहीं।"
“मैं कैसे तुम पर विश्वास करूं?” रत्नाकर ने असहमति से सिर हिलाया।
“तुम्हें लगता है कि मुझे तुम्हारा या मृत्यु का लैशमात्र भी भय है? अगर ऐसा होता तो मैं कब का तुम्हारे चरणों में गिर कर अपने प्राणों की भिक्षा मांग रहा होता।”
महात्मा के अडिग विश्वास ने रत्नाकर को भीतर तक झकझोर दिया। वहाँ रुकना अब उसे कष्टकर प्रतीत हुआ।
वह भागता हुआ अपने घर पहुँचा। लेकिन वहाँ जो सच उसका इंतजार कर रहा था, उसने उसके पैरों तले की जमीन खिसका दी।
माता-पिता और पत्नी ने दो टूक कह दिया, "तुम्हारा धर्म हमारा भरण-पोषण करना है, लेकिन उसके लिए पाप का मार्ग चुनना केवल तुम्हारा निर्णय था। कर्मफल का यह काँटा तुम्हें अकेले ही भोगना होगा।"
इस एक कड़वे सत्य ने रत्नाकर के भीतर के पाशविक अहंकार को हमेशा के लिए भस्म कर दिया। वह बदहवास हालत में वापस जंगल की ओर दौड़ा। वहाँ उन महात्मा की वीणा से फूटते सुरों ने पूरे वन को एक दैवीय शांति में डुबो दिया था।
रत्नाकर का गंडासा कहीं पीछे छूट चुका था।
वह रोता हुआ महात्मा के चरणों में ढह गया और बोला, "ऋषिवर, संसार में मेरा कोई नहीं है। कोई मेरे पापों का बोझ उठाने को तैयार नहीं। मुझे इस घोर नरक से तारिए।"
पूरी कहानी यहाँ है:
r/Hindi • u/Grand_Ad7857 • 3d ago
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r/Hindi • u/Grand_Ad7857 • 3d ago
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